The Journalist News (Lucknow): हाल के महीनों में FCRA Amendment Bill 2026 देश की राजनीति, सामाजिक संगठनों और नीति-निर्माताओं के बीच चर्चा का प्रमुख विषय बन गया है। संसद से लेकर मीडिया और नागरिक समाज तक इस प्रस्तावित संशोधन पर बहस जारी है। आम लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर FCRA क्या है, सरकार इसमें बदलाव क्यों करना चाहती है और इसका असर किन लोगों और संस्थाओं पर पड़ सकता है।
क्या है FCRA?
FCRA यानी Foreign Contribution Regulation Act (विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम) एक ऐसा कानून है, जो विदेशों से भारत आने वाले दान और आर्थिक सहायता को नियंत्रित करता है। यदि कोई ट्रस्ट, सोसायटी, गैर-सरकारी संगठन (NGO) या सेक्शन-8 कंपनी विदेश से आर्थिक सहयोग प्राप्त करना चाहती है, तो उसे इस कानून के तहत पंजीकरण कराना होता है। यह कानून पहली बार 1976 में लागू किया गया था और बाद में 2010 में इसे नए स्वरूप में लागू किया गया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी अंशदान का उपयोग भारतीय कानूनों और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप हो।

देश में कितने संगठन हैं पंजीकृत?
गृह मंत्रालय के अनुसार, वर्तमान में देश में लगभग 16,000 संगठन FCRA के तहत पंजीकृत हैं। इन संस्थाओं को हर वर्ष लगभग 22,000 करोड़ रुपये का विदेशी अंशदान प्राप्त होता है। इस धन का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, बाल कल्याण, ग्रामीण विकास, आपदा राहत और अन्य सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों में किया जाता है। इसलिए FCRA केवल NGOs का विषय नहीं, बल्कि लाखों लाभार्थियों से जुड़ा मुद्दा है।
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FCRA Amendment Bill 2026 में क्या प्रस्ताव है?
केंद्र सरकार ने 25 मार्च 2026 को लोकसभा में FCRA Amendment Bill 2026 पेश किया। यह अभी केवल एक विधेयक है और इसे कानून बनने के लिए संसद के दोनों सदनों से पारित होना तथा राष्ट्रपति की मंजूरी मिलना बाकी है। सरकार का कहना है कि वर्तमान कानून में कुछ व्यावहारिक समस्याएं हैं। कई बार किसी संस्था का FCRA पंजीकरण समाप्त हो जाता है या उसका नवीनीकरण नहीं हो पाता। ऐसे मामलों में विदेशी धन से बनी संपत्तियों और शेष राशि के प्रबंधन को लेकर स्पष्ट व्यवस्था नहीं होती।
“डिज़िग्नेटेड अथॉरिटी” का प्रावधान
विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव “डिज़िग्नेटेड अथॉरिटी” (Designated Authority) की व्यवस्था है। यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण समाप्त हो जाता है, तो विदेशी अंशदान से बनी संपत्तियों और शेष निधि का प्रबंधन यह अधिकृत प्राधिकरण करेगा। सरकार का तर्क है कि इससे सार्वजनिक हित से जुड़ी परिसंपत्तियां निष्क्रिय नहीं होंगी और उनका उपयोग जारी रह सकेगा।
सजा के प्रावधान में भी बदलाव
प्रस्तावित संशोधन में दंड संबंधी नियमों में भी बदलाव का प्रस्ताव है। मौजूदा कानून में कुछ मामलों में अधिकतम पांच वर्ष तक की जेल का प्रावधान है। नए विधेयक में इसे घटाकर अधिकतम एक वर्ष करने का प्रस्ताव रखा गया है। सरकार का कहना है कि इससे कानून अधिक संतुलित और व्यावहारिक बनेगा।
विपक्ष और सामाजिक संगठनों की चिंताएं
इस विधेयक को लेकर विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि प्रस्तावित संशोधन से केंद्र सरकार के अधिकार बढ़ सकते हैं और गैर-सरकारी संगठनों की कार्य स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। उनका मानना है कि सामाजिक संस्थाओं को बिना अनावश्यक प्रशासनिक दबाव के काम करने का अवसर मिलना चाहिए।
धार्मिक संगठनों ने भी जताई चिंता
केरल सहित कुछ राज्यों के ईसाई संगठनों ने भी इस प्रस्ताव पर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि विदेशी सहायता प्राप्त धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह कानून किसी धर्म, समुदाय या संस्था को निशाना बनाने के लिए नहीं है। सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य केवल विदेशी धन के उपयोग में पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हुई चर्चा
यह विषय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में आया जब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत यात्रा के दौरान मिशनरीज ऑफ चैरिटी के मुख्यालय का दौरा किया। गौरतलब है कि मिशनरीज ऑफ चैरिटी का FCRA पंजीकरण वर्ष 2021 में नवीनीकृत नहीं किया गया था। इसके बाद कुछ अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भारत के FCRA कानून पर सवाल उठाए थे। भारत सरकार ने उस समय कहा था कि नियम सभी संस्थाओं पर समान रूप से लागू होते हैं और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि है।
अन्य देशों में भी हैं ऐसे नियम
सरकार का कहना है कि भारत अकेला देश नहीं है जहां विदेशी फंडिंग पर निगरानी रखी जाती है। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कई देशों में भी विदेशी धन प्राप्त करने वाले संगठनों के लिए कड़े नियम लागू हैं।
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