Home Prashant Kishor बिहार में PK की ‘जन सुराज प्रयोग ध्वस्त,आखिर क्यों नहीं चला King Maker का जादू ?
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बिहार में PK की ‘जन सुराज प्रयोग ध्वस्त,आखिर क्यों नहीं चला King Maker का जादू ?

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बिहार में प्रशांत किशोर (पीके) की उम्मीदें हुई धराशायी

  • नीतीश पर पीके का हमला बोलना उनकी हार की प्रमुख वजह
  • पीके बिहार की जनता के दिलों में छाने की, फिर बनाएंगे नई रणनीति

राजेंद्र कुमार :
बिहार विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के साथ ही प्रशांत किशोर (पीके) की जन सुराज पार्टी (जेएसपी) की सारी उम्मीदें धराशायी हो गईं हैं. देश में चुनावी रणनीतिकार के रूप में मशहूर प्रशांत किशोर ने बिहार विधानसभा चुनाव में बदलाव की मुहिम का नारा देकर अपनी सियासी पारी शुरू की थी. परन्तु बिहार की जनता ने प्रशांत किशोर पर भरोसा नहीं किया. उनकी पार्टी के बिहार में चुनाव लड़ने वाले सभी 238 प्रत्याशियों को को जनता ने हार दिया. इन प्रत्याशियों को जिताने वाली प्रशांत कुमार की रणनीति चुनाव परिणाम के दौरान नहीं दिखाई थी. कुल मिलाकर कहा जाए तो बिहार विधानसभा के चुनाव परिणाम में प्रशांत किशोर ढोल के पोल साबित हुए. इसके बाद भी प्रशांत कुमार की सियासी पारी इन चुनाव परिणाम से अभी खत्म नहीं हुई है. प्रशांत किशोर का बिहार में किया गया प्रयोग एक स्थायी राजनीतिक ताकत के तौर पर परिपक्व होगा या नहीं, यह देखना अभी बाकी है. कहा जा रहा है कि प्रशांत किशोर अगर बिहार में राज्य में जमे रहते हैं तो अगले पांच साल उनके लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं. और प्रशांत किशोर बिहार की सत्ता के सबसे बड़े दावेदारों में से एक बनकर उभर सकते हैं, ना सिर्फ एक बदलाव लाने वाले नेता के तौर पर बल्कि शासन के लिए तैयार एक विश्वसनीय विकल्प के तौर पर प्रशांत कुमार का नाम लिया जा सकता.

इसलिए लगा झटका :
हालांकि बिहार के चुनाव परिणाम प्रशांत कुमार के लिए एक बड़ा झटका है. वह पिछले तीन वर्ष से बिहार के गांव-गांव में घूमकर जनता की नब्ज टटोल रहे थे. बिहार के लोगों की बेरोजगारी, वहां से होने वाले पलायन के मुद्दे को उन्होने ज़ोरदार तरीके से उठाया. शराबबंदी के खिलाफ माहौल बनाने में भी उन्होंने बिहार के लोगों को एकजुट करने का प्रयास किया.इसके लिए उन्होंने बीते साल दो अक्टूबर को जेसपी का गठन किया. फिर बिहार में हुए उपचुनाव में प्रत्याशी खड़ा कर अपनी ताकत का अहसास कराया. इसके बाद विधानसभा चुनाव में 238 सीटों पर प्रत्याशी खड़े किए. उन्हें जिताने के लिए प्रशांत कुमार ने पूरी ताकत लगाई. इसके बाद भी उनकी पार्टी का एक भी उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सका.सबको बिहार की जनता नकार दिया. कहा जा रहा है कि इसकी ख़ास वजह है, उनका नीतीश कुमार का किया गया खुला विरोध. बिहार में नीतीश कुमार को लेकर जनता में नाराजगी नहीं है. इसके बाद भी बड़बोलापन में प्रशांत किशोर ने यह दावा किया कि बिहार में किसी की भी सरकार बनने पर नीतीश अगले मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे. उन्होने यह भी दावा किया किया, “इस बार बिहार में जनता दल यूनाइटेड को 25 सीट से ज्यादा नहीं मिलेंगी और यदि ऐसा हुआ तो वो संन्यास ले लेंगे. पटना में एक बड़े प्रतिष्ठित दैनिक के संपादक अजय कुमार के अनुसार प्रशांत कुमार के ऐसे ही तमाम दावे उनकी पार्टी को ले डूबे हैं.

मेहनत तो की पर जनता के दिल में न उतार सके पीके :
बिहार की राजनीति के प्रमुख जानकार राजेंद्र तिवारी के अनुसार, प्रशांत किशोर आंकड़ों के बाज़ीगर भले रहे हों लेकिन नीतीश कुमार को नीशने में लेने का दांव ही प्रशांत किशोर पर भारी पड़ा है. प्रशांत कुमार नीतीश कुमार को आड़े हाथों लेने के अपने जुनून में अपना सारा करतब चुनावी रण में गंवा बैठे. बिहार के लोग यह कहने लगे कि प्रशांत कुमार भाजपा के टूल हैं.महागठबंधन के वोट काटने के लिए उन्हें चुनाव मैदान में उतारा गया है. ऐसी चर्चाओं की अनदेखी कर सोशल मीडिया के हीरो बन कर रह गए और केजरीवाल की तरह बिहार चुनाव जीतने का दावा करने लगे. जबकि जनता के दिलों में वह अपने को उतार सके. हालांकि प्रशांत किशोर बिहार में जनसुराज पद यात्रा की शुरुआत जनता को अपने साथ जोड़ने के लिए ही की. 2 अक्टूबर 2022 को उन्होंने पश्चिम चंपारण के भितिहरवा गांधी आश्रम से अपनी यह पद यात्रा शुरू की थी, जो लगभग 3000 किलोमीटर लंबी थी. प्रशांत किशोर जनसुराज पद यात्रा के दौरान तंबुओं से बनाए गए पदयात्रा कैंप में ही रात्रि विश्राम करते थे और उस इलाके की समस्याओं की जानकारी लेते थे. इस यात्रा के दौरान प्रशांत किशोर ने लगभग पांच हजार से अधिक गांवों में जाकर संवाद किया था, इसके बाद उन्होंने जन सुराज पार्टी की स्थापना की. यही नहीं प्रशांत किशोर ने बिहार विधानसभा चुनाव में मतदाताओं से राज्य के विकास, शिक्षा और रोजगार के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हुए इस बार नया विकल्प ‘जन सुराज पार्टी’ को चुनने की अपील की थी. उन्होने बिहार के लोगों से अपने बच्चों के भविष्य के लिए वोट करने का आग्रह किया था. न कि पारंपरिक राजनीतिक दलों या नेताओं के बच्चों के लिए. इसके बाद भी वह बिहार की जनता के प्रिय नेता नहीं बन सके. बिहार के चुनाव परिणाम यह बता रहे हैं.

नई शुरुआत के लिए करना होगा मंथन :
अब प्रशांत किशोर को यह विचार करना होगा कि उनकी आगे की राजनीति क्या हो? यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि उन्होने बिहार में मुद्दे अच्छे और जनता से जुड़े हुए उठाये थे पर जनता की नब्ज टटोलने में फेल रहे. अब ऐसा क्यों हुआ? इसकी खोज करनी होगी. यह ध्यान रखते हुए कि गांव-गांव घूमने से आपकी पहचान तो बनती है पर इससे आप राजा नहीं बन पाते. जनसंघ जिसका गठन 1950 में हुआ था, उसके हाथ में भी सत्ता 1996 में आ पाई. इसलिए प्रशांत किशोर को नए सिरे ने अपनी आगे की राजनीति की भूमिका तय करने के लिए बिहार के चुनावों में इस बार हुई वोटिंग के पैटर्न पर भी ध्यान देना होगा. अपनी खामियों पर भी ध्यान देना होगा.यह भी ध्यान देना होगा कि बिहार में इस बार एनडीए को इतनी जबरदस्त सफलता कैसे मिली. क्यों चिराग़ पासवान को तो शत-प्रतिशत सफलता मिली है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा बार-बार मुद्दों से हटकर सवर्ण जातियों की अस्मिता पर टिप्पणी करना करना क्या उनको उल्टा पड़ गया? इसका भी विश्लेषण प्रशांत किशोर को करना होगा. उन्हे आरजेड़ी की हारके साथ बिहार विधानसभा चुनाव में मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के सूपड़ा साफ होने की वजहों की समीक्षा कर अपनी आगे ही रणनीति को तैयार करना होगा. तब ही प्रशांत किशोर बिहार और देश की राजनीति में एक नई पटकथा लिखने में सफल होंगे.बिहार की राजनीति पर निगाह रखने वाले तमाम लोगों का कहना है कि इस चुनाव में हुई हार के बाद प्रशांत किशोर का प्रयोग एक स्थायी राजनीतिक ताकत के तौर पर परिपक्व होगा या नहीं, यह देखना अभी बाकी है. उन्होने बिहार को बदले के लिए जो तीन साल कार्य किया है, वह किसी राज्य को बदलने के लिए बहुत कम समय है. इस चुनाव में उन्हे भले ही बिहार ने ताज नहीं पहनाया है, लेकिन जन सुराज पार्टी को आगे ले जाने की शुरुआत का रास्ता भी अभी बंद नहीं हुआ है. यह ध्यान में रखकर ही प्रशांत किशोर को आगे की रणनीति तैयार करनी है.

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