The Journalist News (Lucknow): पश्चिम बंगाल में प्रस्तावित यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को लेकर सियासी माहौल गरमा गया है। इस मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सांसद Sagarika Ghose ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि इतने महत्वपूर्ण कानून को लागू करने से पहले सभी समुदायों के साथ व्यापक स्तर पर चर्चा और सहमति बनाना जरूरी है। सागरिका घोष ने कहा कि बिना पर्याप्त परामर्श और आम सहमति के उनकी पार्टी यूसीसी का समर्थन नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि इस तरह के संवेदनशील विषय पर जल्दबाजी में फैसला लेने के बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।
‘व्यापक चर्चा के बिना UCC स्वीकार नहीं’
टीएमसी सांसद ने कहा कि यूनिफॉर्म सिविल कोड जैसा कानून देश के विभिन्न समुदायों और उनकी परंपराओं से जुड़ा हुआ विषय है। ऐसे में सरकार को सभी पक्षों की राय सुननी चाहिए। उन्होंने कहा कि सभी समुदायों, विशेषकर वंचित वर्गों, अल्पसंख्यकों और आदिवासी समुदायों को इस प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि सभी हितधारकों की राय लिए बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

बीजेपी की मंशा पर उठाए सवाल
सागरिका घोष ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि उनकी पार्टी को भाजपा की नीयत पर भरोसा नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर इस समय यूसीसी को आगे बढ़ाने की क्या जरूरत है। उनके अनुसार, जब भी भाजपा कोई नया कानून लेकर आती है, तब कई बार सामाजिक तनाव, विवाद और समुदायों के बीच टकराव की स्थिति देखने को मिलती है। इसी वजह से उनकी पार्टी इस मुद्दे पर सरकार के इरादों को लेकर आशंकित है। उन्होंने कहा कि उनकी चिंता केवल कानून को लेकर नहीं, बल्कि उसके लागू किए जाने के तरीके और समय को लेकर भी है।
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‘सभी समुदायों को विश्वास में लेना जरूरी’
टीएमसी सांसद ने कहा कि किसी भी बड़े सामाजिक या कानूनी बदलाव के लिए सरकार को पहले व्यापक संवाद स्थापित करना चाहिए। उनका कहना है कि यदि सरकार वास्तव में देशहित में कोई कानून लाना चाहती है, तो उसे सभी वर्गों की राय लेकर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने दोहराया कि लोकतंत्र में सहमति और संवाद सबसे महत्वपूर्ण होते हैं और इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
राजनीतिक बहस तेज होने के आसार
पश्चिम बंगाल में यूसीसी को लेकर शुरू हुई बहस आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है। एक ओर भाजपा इसे समान नागरिक अधिकारों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बता रही है, वहीं विपक्षी दल प्रक्रिया, समय और सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं। ऐसे में यह मुद्दा केवल कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का भी केंद्र बनता जा रहा है। आने वाले समय में इस विषय पर विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रियाएं भी अहम मानी जाएंगी।
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