हरियाणा के रोहताश खिलेरी ने ऐसा साहसिक कारनामा कर दिखाया है, जिसने इंसानी सहनशक्ति और हौसले की परिभाषा को नई ऊंचाई दे दी है। रोहताश का दावा है कि उन्होंने यूरोप की सबसे ऊंची चोटी माउंट एल्ब्रुस पर बिना ऑक्सीजन के पूरे 24 घंटे अकेले बिताए। यह उपलब्धि न केवल शारीरिक ताकत, बल्कि मानसिक दृढ़ता की भी बड़ी परीक्षा मानी जा रही है।
माउंट एल्ब्रुस: जहां सांस लेना भी चुनौती
माउंट एल्ब्रुस रूस में स्थित है और इसकी ऊंचाई लगभग 5,642 मीटर है। इतनी ऊंचाई पर ऑक्सीजन का स्तर बेहद कम हो जाता है, जिससे सांस लेना मुश्किल हो जाता है। आमतौर पर पर्वतारोही यहां अतिरिक्त ऑक्सीजन सिलेंडर का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन रोहताश खिलेरी ने इस कठिन चोटी पर बिना किसी ऑक्सीजन सपोर्ट के 24 घंटे बिताकर खुद को एक असाधारण साहसिक खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया है। विशेषज्ञों के अनुसार, इतनी ऊंचाई पर लंबे समय तक रहना शरीर पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। सिरदर्द, चक्कर आना, सांस फूलना और मानसिक भ्रम जैसी समस्याएं आम हैं। ऐसे हालात में अकेले रहना जोखिम को और बढ़ा देता है। बावजूद इसके, रोहताश ने यह चुनौती स्वीकार की और सफलतापूर्वक पूरी की।
हरियाणा से यूरोप की ऊंचाइयों तक
हरियाणा के रहने वाले रोहताश खिलेरी पहले से ही फिटनेस और एडवेंचर गतिविधियों से जुड़े रहे हैं। उन्होंने कठिन ट्रेनिंग, मानसिक तैयारी और अनुशासन के दम पर इस मिशन को अंजाम दिया। उनका यह प्रयास न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि भारत के एडवेंचर स्पोर्ट्स समुदाय के लिए भी गर्व का विषय बन गया है। रोहताश का कहना है कि यह सफर आसान नहीं था। माइनस तापमान, तेज हवाएं और ऑक्सीजन की कमी ने हर पल उनकी परीक्षा ली। फिर भी उन्होंने खुद पर भरोसा रखा और अपने लक्ष्य पर डटे रहे।
सोशल मीडिया पर शेयर किया अनुभव
रोहताश खिलेरी ने इस ऐतिहासिक अनुभव का वीडियो अपने Instagram अकाउंट (@rohtashkhileri) पर साझा किया है। वीडियो में उन्हें माउंट एल्ब्रुस की चोटी पर अकेले समय बिताते देखा जा सकता है। सोशल मीडिया पर यह वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है और लोग उनकी हिम्मत की तारीफ कर रहे हैं। वीडियो के साथ यह भी स्पष्ट किया गया है कि इसके उपयोग के लिए पूरी अनुमति उपलब्ध है। यदि किसी को कोई सवाल या स्पष्टीकरण चाहिए, तो वे रोहताश से डायरेक्ट मैसेज (DM) के जरिए संपर्क कर सकते हैं।

शारीरिक नहीं, मानसिक जंग भी
एडवेंचर एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इस तरह की उपलब्धियां सिर्फ शारीरिक क्षमता से नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती से हासिल होती हैं। बिना ऑक्सीजन इतनी ऊंचाई पर अकेले रहना डर, थकान और अनिश्चितता से लड़ने जैसा है। रोहताश की यह उपलब्धि दिखाती है कि सही तैयारी और मजबूत इरादों से इंसान अपनी सीमाओं को पार कर सकता है।
युवाओं के लिए प्रेरणा
रोहताश खिलेरी की यह कहानी खास तौर पर युवाओं के लिए प्रेरणादायक है। यह साबित करती है कि छोटे शहर या गांव से निकलकर भी वैश्विक स्तर पर पहचान बनाई जा सकती है। उनका यह कदम युवाओं को फिटनेस, अनुशासन और आत्मविश्वास की अहमियत समझाता है। आज जब ज्यादातर युवा आरामदायक जीवनशैली की ओर बढ़ रहे हैं, रोहताश की यह उपलब्धि बताती है कि कठिन रास्ते ही असली सफलता की ओर ले जाते हैं।
भारत के लिए गर्व का क्षण
हालांकि इस उपलब्धि को लेकर औपचारिक रिकॉर्ड प्रक्रिया की जानकारी अभी सामने नहीं आई है, लेकिन रोहताश का यह दावा अपने आप में ऐतिहासिक माना जा रहा है। यह भारत को अंतरराष्ट्रीय एडवेंचर स्पोर्ट्स मैप पर एक बार फिर मजबूती से स्थापित करता है।
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