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पत्नी की हत्या पर सुप्रीम कोर्ट का करारा झटका: NSG कमांडो को नहीं मिली छूट | 10 साल की सजा बरकरार

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NSG कमांडो बलजिंदर सिंह पत्नी हत्या मामला
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नई दिल्ली | 25 जून 2025
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक बेहद अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि देश के लिए की गई बहादुरी भले ही सराहनीय हो, लेकिन वह घरेलू हिंसा जैसे संगीन अपराधों पर कोई “ढाल” नहीं बन सकती। यह टिप्पणी राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) के पूर्व कमांडो बलजिंदर सिंह की याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई, जिन पर अपनी पत्नी की कथित हत्या का आरोप है।

बलजिंदर सिंह ने कोर्ट से आत्मसमर्पण से अस्थायी छूट मांगी थी और तर्क दिया था कि उन्होंने “ऑपरेशन सिंदूर” सहित कई सैन्य अभियानों में भाग लिया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह तर्क खारिज कर दिया और कहा कि कानून की नजर में सभी नागरिक बराबर हैं, चाहे वे युद्ध के नायक हों या आम नागरिक।


केस का बैकग्राउंड: दहेज हत्या का गंभीर आरोप

बलजिंदर सिंह, जो 20 वर्षों तक सेना और राष्ट्रीय राइफल्स में सेवाएं दे चुके हैं, पर भारतीय दंड संहिता की धारा 304बी के तहत दहेज हत्या का आरोप है। आरोप के मुताबिक, उन्होंने अपनी पत्नी की कथित रूप से गला घोंटकर हत्या कर दी थी। मामले में कई गवाहों ने कोर्ट में बयान दिया कि बलजिंदर के साथ-साथ उनके परिवार के कुछ सदस्यों ने भी इस अपराध में भाग लिया।

हालांकि, निचली अदालत ने उनके माता-पिता और बहनों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया, लेकिन बलजिंदर को दोषी ठहराया। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के इस फैसले को बरकरार रखा।


सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

जस्टिस उज्जल भुयान और जस्टिस विनोद चंद्रन की पीठ के सामने बलजिंदर सिंह की विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई हुई। बलजिंदर के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल ने 20 वर्षों तक भारतीय सेना और एनएसजी में सेवा की है और कई ऑपरेशनों में भाग लिया है। उन्होंने कहा कि बलजिंदर “ऑपरेशन सिंदूर” के हिस्सा थे, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ गुप्त अभियानों को अंजाम दिया।

लेकिन अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा:

“देश के लिए सेवा करना गर्व की बात हो सकती है, लेकिन यह किसी को अपनी पत्नी की हत्या करने की छूट नहीं देता।”

जस्टिस भुयान ने टिप्पणी की:

“यह तो केवल यह दिखाता है कि आप शारीरिक रूप से कितने सक्षम हैं — अकेले एक महिला को गला घोंट सकते हैं। यह हत्या अत्यंत वीभत्स है, और इसे मामूली अपराध नहीं कहा जा सकता।”


गवाहों के बयानों ने किया केस को मज़बूत

मृतका के भाई और उसकी पत्नी ने गवाही दी कि उन्होंने बलजिंदर सिंह और उनके पिता को कपड़े से पत्नी का गला घोंटते हुए देखा था, जबकि उनकी मां और बहनें मृतका के हाथ-पैर पकड़े हुए थीं। गवाहों के अनुसार, पीड़िता को तड़पता छोड़कर पूरा परिवार मौके से फरार हो गया था।

हालांकि, कोर्ट ने गवाहों की विश्वसनीयता को लेकर संतोषजनक मत व्यक्त किया और इस आधार पर परिवार के अन्य सदस्यों को बरी कर दिया, लेकिन बलजिंदर को मुख्य दोषी माना गया।


निचली अदालत और हाई कोर्ट का रुख

बलजिंदर सिंह को शुरू में निचली अदालत ने 3 वर्ष की सजा सुनाई थी। अपील के चलते उन्हें जेल से बाहर रहने की अनुमति मिल गई। लेकिन मई 2025 में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए उनकी सजा बढ़ाकर 10 वर्ष का कठोर कारावास कर दिया।

इसके बाद बलजिंदर सिंह ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और आत्मसमर्पण से छूट की मांग की — लेकिन कोर्ट ने राहत देने से साफ इनकार कर दिया।


सुप्रीम कोर्ट का फैसला: कोई छूट नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया:

“हम आत्मसमर्पण से छूट की प्रार्थना को अस्वीकार करते हैं। अभियोजन पक्ष को नोटिस जारी किया जाता है, जिसे 6 सप्ताह में जवाब देना होगा।”

इसका अर्थ साफ है — बलजिंदर सिंह को अब आत्मसमर्पण करना होगा और उन्हें जेल भेजा जाएगा।


क्यों है ये मामला अहम?

यह मामला केवल एक आपराधिक अभियोग नहीं, बल्कि उससे कहीं अधिक है। यह देश के न्यायिक और नैतिक मूल्यों को सामने लाता है। इस केस में तीन बड़े सवाल उभरते हैं:

  1. क्या देश के लिए सेना में सेवा देने से किसी को कानून से छूट मिलनी चाहिए?
  2. क्या बहादुरी की आड़ में घरेलू हिंसा जैसे अपराधों को नजरअंदाज किया जा सकता है?
  3. क्या हम किसी नायक के व्यक्तिगत आचरण को सार्वजनिक सम्मान से अलग रख सकते हैं?

इन सवालों के जवाब लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने में सहायक हो सकते हैं।


क्या है ऑपरेशन सिंदूर?

‘ऑपरेशन सिंदूर’ एक गुप्त सैन्य मिशन था, जो सीमा पार खुफिया कार्रवाइयों से जुड़ा बताया गया है। हालांकि इसकी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं है, लेकिन बलजिंदर सिंह ने इसे अपनी “देशभक्ति” का प्रमाण मानते हुए अदालत से विशेष राहत की उम्मीद की थी।

यह मामला भारतीय न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी पारदर्शिता का उदाहरण है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक सख्त संदेश है कि:

“देशभक्ति का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति घरेलू जिम्मेदारियों से या अपराधों से मुक्त हो जाए।”

बलजिंदर सिंह जैसे NSG कमांडो ने भले ही युद्धभूमि में पराक्रम दिखाया हो, लेकिन यदि वे अपने ही घर में पत्नी की हत्या जैसे अपराध में दोषी हैं, तो उनका ओहदा उन्हें अपराध से बचा नहीं सकता।

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