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“बिहार चुनाव में बीएसपी की पूरी ताकत झोंकेंगी मायावती, कल भभुआ में करेंगी बड़ी जनसभा”

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में अब बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की भी एंट्री हो गई है। पार्टी प्रमुख बहन मायावती कल बिहार के कैमूर जिले के भभुआ में एक बड़ी चुनावी जनसभा को संबोधित करेंगी।

सूत्रों के अनुसार, यह जनसभा भभुआ हवाई अड्डे के पास के मैदान में आयोजित की जाएगी, जहां दोपहर के समय हजारों समर्थकों के जुटने की संभावना है। इस जनसभा में पड़ोसी जिलों और विधानसभा क्षेत्रों के कार्यकर्ता व समर्थक भी शामिल होंगे।

बीएसपी इस बार बिहार विधानसभा चुनाव पूरी तरह अपने दम पर लड़ रही है। पार्टी ने लगभग सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा की है। मायावती के इस दौरे को बीएसपी के चुनावी अभियान की शुरुआत माना जा रहा है।

जनसभा में मायावती के साथ पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद, राज्यसभा सांसद और राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर रामजी गौतम, तथा वरिष्ठ नेता अनिल सिंह भी मौजूद रहेंगे।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मायावती की यह सभा बिहार के सीमांचल और मगध क्षेत्र में दलित और पिछड़े वोटरों को साधने की रणनीति का हिस्सा है। बीएसपी इस बार प्रदेश में अपने संगठन को मजबूत करने और नई राजनीतिक जमीन तैयार करने की दिशा में काम कर रही है।

सीमावर्ती जिलों में मायावती की गहरी रणनीति

बीएसपी का फोकस इस बार बिहार के पश्चिमी सीमावर्ती जिलों, कैमूर, रोहतास, बक्सर और भोजपुर (आरा), पर है। यह वे इलाके हैं, जो उत्तर प्रदेश से सटे हुए हैं और जहां मायावती की सामाजिक इंजीनियरिंग की रणनीति अच्छी तरह काम कर सकती है।
इन जिलों में दलित, पासी, कोरी, मुसहर, निषाद और अन्य पिछड़े वर्गों की आबादी प्रभावशाली है, जो स्थानीय चुनावों में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मायावती इन इलाकों में उत्तर प्रदेश मॉडल की पुनरावृत्ति करना चाहती हैं, यानी दलित-पिछड़ा- मुस्लिम गठजोड़ के जरिए एक तीसरा विकल्प खड़ा करना।

बीएसपी का “अकेले चुनाव लड़ने” का फैसला

मायावती ने पहले ही साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी इस बार बिहार विधानसभा चुनाव की सभी 243 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी।
उनका यह ऐलान केवल चुनावी घोषणा नहीं, बल्कि यह संकेत भी है कि बीएसपी अब बिहार में दीर्घकालिक राजनीतिक उपस्थिति स्थापित करने के लिए गंभीर है।
पार्टी का मानना है कि गठबंधन की राजनीति में हमेशा “छोटे साथी” के रूप में रहना उसकी पहचान को कमजोर करता है, इसलिए इस बार वह स्वतंत्र पहचान और संगठन शक्ति के बल पर मैदान में उतरना चाहती है।

भभुआ की जनसभा से नई शुरुआत

मायावती कल कैमूर जिले के भभुआ में एक बड़ी चुनावी जनसभा को संबोधित करेंगी। यह रैली बीएसपी के लिए मिशन बिहार की औपचारिक शुरुआत मानी जा रही है।
कार्यक्रम भभुआ हवाई अड्डे के पास विशाल मैदान में आयोजित होगा, जहां हजारों समर्थकों के जुटने की संभावना है।
इस जनसभा में पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद, राज्यसभा सांसद रामजी गौतम, और वरिष्ठ नेता अनिल सिंह भी मंच साझा करेंगे।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह रैली बीएसपी के लिए केवल जनसंपर्क का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि शक्ति प्रदर्शन और संगठन विस्तार का संकेत भी है। पार्टी यह दिखाना चाहती है कि वह बिहार की सियासत में मौजूद है और प्रभाव डालने की क्षमता रखती है।

बीएसपी की “ग्राउंड लेवल” तैयारी

बिहार में बीएसपी पिछले कई महीनों से बूथ स्तर पर संगठन खड़ा करने में जुटी है। पार्टी ने हर जिले में बहुजन समरसता सम्मेलन, युवा जागरूकता अभियान और दलित अधिकार यात्रा जैसे कार्यक्रम चलाए हैं।
इन अभियानों के जरिए बीएसपी ने अपने पुराने समर्थकों को फिर से जोड़ा है और नये युवाओं को पार्टी के साथ लाने का प्रयास किया है।
साथ ही, पार्टी ने महिलाओं और युवाओं के लिए अलग-अलग मोर्चे भी बनाए हैं, जिनकी अगुवाई स्थानीय स्तर पर की जा रही है।

मायावती की “किंगमेकर” रणनीति

भले ही बीएसपी को बिहार में अभी तक कोई बड़ी चुनावी सफलता नहीं मिली हो, लेकिन इस बार मायावती का मकसद सीट जीतने से ज्यादा सत्ता समीकरणों को प्रभावित करने का है।
यदि बीएसपी कुछ सीटों पर भी अच्छी पकड़ बनाती है, तो वह पोस्ट-पोल गठबंधन (Post-poll alliance) की राजनीति में अहम भूमिका निभा सकती है।
ऐसे में मायावती बिहार की सियासत में “किंगमेकर” की भूमिका में आ सकती हैं, यानी न तो पूरी तरह सत्ता से बाहर और न ही निर्णायक समर्थन से दूर।

जातीय समीकरण का गणित

राजनीतिक आंकड़ों के अनुसार, बिहार की कुल आबादी में दलित समुदाय लगभग 16%, जबकि अति पिछड़ा वर्ग करीब 22% है।
मायावती का लक्ष्य इन दोनों वर्गों को एक मंच पर लाना है। अगर वह इस वोट बैंक का 10–12% हिस्सा भी अपने पक्ष में कर लेती हैं, तो कई विधानसभा सीटों पर तीसरा ध्रुव बन सकता है।
बीएसपी के रणनीतिकार मानते हैं कि “छोटे वोट प्रतिशत” वाले राज्यों में भी अगर सामाजिक समीकरण सही तरीके से साध लिए जाएं, तो गठबंधन की राजनीति में बार्गेनिंग पावर हासिल की जा सकती है।

मायावती की यह रणनीति स्पष्ट है, बिहार में लंबी पारी खेलने की।
बीएसपी का लक्ष्य सिर्फ इस चुनाव में कुछ सीटें जीतना नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में बिहार में अपनी राजनीतिक जड़ें मजबूत करना है।
भभुआ की रैली इस अभियान की पहली बड़ी परीक्षा होगी।
अब देखना यह है कि क्या मायावती की यह “शांत पर सटीक चाल” बिहार की सियासत में नई बिसात बिछा पाती है या नहीं।

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