Home उत्तर प्रदेश विपक्ष की मांग के आगे मजबूर हुए यूपी सीएम, रोकना पड़ा रजिस्ट्रार और सब रजिस्ट्रार का ट्रांसफर, होगी जांच
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विपक्ष की मांग के आगे मजबूर हुए यूपी सीएम, रोकना पड़ा रजिस्ट्रार और सब रजिस्ट्रार का ट्रांसफर, होगी जांच

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ट्रांसफर कैंसिल
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य में स्टाम्प विभाग के सभी रजिस्ट्रार और सब रजिस्ट्रार के ट्रांसफर रोक लगाने के लिए जांच के आदेश दे दिए हैं। योगी सरकार की तरफ से जारी आदेश में कहा गया है कि, महानिरीक्षक निबन्धन, उ०प्र० लखनऊ के पत्र सं०-2018/शि०का०लख०/2025 दिनांक 14.06.2025 द्वारा जिला अधिष्ठान के कुल 114 कनिष्ठ सब रजिस्ट्रार का ट्रांसफर किया गया है।

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प्रमुख सचिव अमित गुप्ता द्वारा हस्ताक्षरित कार्यालय की तरफ से कहा गया है कि, शासन की तरफ से विचार के बाद तात्काल प्रभाव से उपर्युक्त सभी स्थानान्तरण/तैनाती आदेशों को अग्रिम आदेशों तक स्थगित किया जाता है। रजिस्ट्रार और सब रजिस्ट्रार के पदों पर ट्रांसफर अचानक रोकने के पीछे ये मुख्य कारण स्टाम्प एवं रजिस्ट्रेशन विभाग में अनियमितता की शिकायत को माना जा रहा है। दरअसल, विभाग में हालिया ट्रांसफ़र लिस्ट में गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार के आरोप उठे थे। जिसमें चार महीने या एक साल से भी कम समय में नियुक्त अधिकारियों का ट्रांसफ़र शामिल था, जबकि नियमानुसार ऐसा नहीं किया जा सकता है। अनियमितता की सूचना मिलते ही योगी आदित्यनाथ ने तुरंत हस्तक्षेप किया। और उन्होंने सभी ट्रांसफ़र को तत्काल रद्द कर जांच के निर्देश दिए। यह कदम पारदर्शिता और नियम पालन पर ज़ोर देने की दृष्टि से उठाया गया था।

सीएम योगी आदित्यनाथ by Google

बता दें कि, योगी सरकार ने ट्रांसफ़र पॉलिसी में बदलाव किया है। साल 2022 के समय से लागू नीति अनुसार, ‘समूह क/ख’ के अधिकारी ज्यादा से ज्यादा 3 साल तक एक जिले में और 7 साल तक ही एक मंडल में रह सकते हैं। इनमें कम समय में ट्रांसफ़र होना नियम के अनुसार नहीं है। हालांकि, स्टाम्प विभाग की हालिया लिस्ट में इस नीति का उल्लंघन हुआ। जिसको लेकर कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेता‑नेताओं ने इसे भ्रष्टाचार से जोड़ कर सवाल उठाए, और उन्होंने जांच की भी मांग की। सरकार ने इन आरोपों को गंभीरता से लिया और तुरंत रोक लगा दी।

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बताते चलें कि, साल 2022 से पहले कोई स्पष्ट नियम नहीं था कि, अधिकारियों को कितने सालों बाद किसी जिले या मंडल से तबादला निश्चित होना चाहिए। अधिकतर ऐसी टीमें जो लंबे समय से पोस्टेड रहती थीं, वैसे ही बनी रहती थीं। ट्रांसफर ज़रूरत, विभागीय आदेश, शिकायत, प्रदर्शन आदि के आधार पर शुरू होते थे। इनकी कोई निर्धारित “सेशन” या जून-जुलाई की समयावधि नहीं होती थी। IAS/PCS स्तर के ट्रांसफर सामान्यत DoAP यानि Appointment & Personnel डिपार्टमेंट या CM के कहने पर भी होते थे। साथ ही अधीनस्थ कर्मचारियों में विभागीय आज्ञा से ही तबादला होता था। 2022 से पहले कोई सार्वभौमिक ऑनलाइन ट्रांसफर (जैसे Manav Sampada आधारित) सिस्टम नहीं था। अधिकांश ट्रांसफर ऑफ़लाइन कागजात और हस्ताक्षर पर निर्भर रहते थे।

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जाहिर है इस कार्रवाई से ये तो साफ हो गया है कि, योगी सरकार ट्रांसफ़र नीति के उल्लंघन और भ्रष्टाचार की किसी भी संभावना पर नरम नहीं है, और इस मामले में सख्त और त्वरित कदम उठाए गए हैं।

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Ankur Bajpai
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