बुलंदशहर। स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल राष्ट्रीय स्तर के बड़े नेताओं तक सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे अनेक स्थानीय सेनानी भी रहे, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष में अपना पेशा, संपत्ति, प्रतिष्ठा और जीवन तक समर्पित कर दिया। बुलंदशहर के बाबू ब्रिज बिहारी लाल, जिन्हें ‘ब्रह्मानंद वकील’ के नाम से भी जाना जाता था, ऐसे ही स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल रहे।
प्रतिष्ठित फौजदारी अधिवक्ता होने के साथ-साथ वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रिय नेता, बुलंदशहर नगरपालिका बोर्ड के अध्यक्ष और संयुक्त प्रांतीय विधानसभा के सदस्य रहे। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं को आर्थिक सहायता, कानूनी सहयोग और आश्रय देने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है।
1889 में बुलंदशहर में हुआ जन्म
बाबू ब्रिज बिहारी लाल का जन्म सन् 1889 में बुलंदशहर नगर में हुआ था। वे कायस्थ परिवार से थे और उनके पिता का नाम बाबू भगवती सहाय बताया जाता है।
उन्होंने एम.ए. और एल.एल.बी. की शिक्षा प्राप्त की। विधि की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने बुलंदशहर में अधिवक्ता के रूप में अपना पेशेवर जीवन शुरू किया। फौजदारी मामलों के वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में उन्होंने जिला बार में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
‘ब्रह्मानंद वकील’ के नाम से भी बने पहचान
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनकी गतिविधियां केवल सार्वजनिक राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रहीं। आंदोलन से जुड़े लोगों के बीच वे ‘ब्रह्मानंद वकील’ के नाम से भी पहचाने जाते थे।
ब्रिटिश शासन की कड़ी निगरानी के दौर में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों को कानूनी और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना जोखिम भरा काम था। इसके बावजूद ब्रिज बिहारी लाल ने आंदोलनकारियों के साथ खड़े रहने की भूमिका निभाई।
कांग्रेस से जुड़े, संगठन में निभाई सक्रिय भूमिका
जलियांवाला बाग कांड के बाद देश में बढ़े राजनीतिक आक्रोश और महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले असहयोग आंदोलन के दौर में ब्रिज बिहारी लाल कांग्रेस से जुड़े।
इसके बाद वे बुलंदशहर जिला कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए। उनका राजनीतिक जीवन केवल चुनावी गतिविधियों तक सीमित नहीं था। वे आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं और उनके परिवारों की सहायता के लिए भी सक्रिय रहे।
1928 में बने नगरपालिका बोर्ड के अध्यक्ष
सन् 1928 में ब्रिज बिहारी लाल बुलंदशहर नगरपालिका बोर्ड के अध्यक्ष निर्वाचित हुए।
उस समय नगरपालिका स्थानीय प्रशासन का महत्वपूर्ण केंद्र थी। स्वच्छता, जलापूर्ति, प्राथमिक शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और बाजार व्यवस्था जैसे विषयों में नगरपालिका की भूमिका अहम थी।
नगरपालिका अध्यक्ष के रूप में उनका निर्वाचन उनके सामाजिक और सार्वजनिक प्रभाव को दर्शाता है।

1937 में संयुक्त प्रांतीय विधानसभा पहुंचे
सन् 1937 में भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत हुए प्रांतीय चुनावों में ब्रिज बिहारी लाल संयुक्त प्रांतीय विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए।
यह उनके लंबे सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव था। इस चुनाव के बाद संयुक्त प्रांत में कांग्रेस की भूमिका मजबूत हुई और भारतीय नेताओं की प्रांतीय राजनीति में भागीदारी बढ़ी।
स्वतंत्रता आंदोलन को दिया आर्थिक सहयोग
ब्रिज बिहारी लाल के योगदान का महत्वपूर्ण पक्ष उनका आर्थिक सहयोग भी बताया जाता है। एक स्थापित अधिवक्ता होने के कारण उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत थी और उपलब्ध विवरणों के अनुसार उन्होंने अपनी आय का एक हिस्सा स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कार्यों में लगाया।
स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों की आर्थिक मदद, मुकदमों में कानूनी सहायता, आंदोलन से जुड़ी प्रचार सामग्री और जरूरतमंद कार्यकर्ताओं की सहायता जैसे कार्यों में उनके योगदान का उल्लेख मिलता है।
उस दौर में किसी स्वतंत्रता सेनानी की गिरफ्तारी का असर पूरे परिवार पर पड़ता था। ऐसे समय में स्थानीय स्तर पर मिलने वाली आर्थिक सहायता आंदोलनकारियों के परिवारों के लिए बड़ा सहारा होती थी।
आंदोलनकारियों के लिए कानूनी ढाल बने
फौजदारी मामलों के अनुभवी अधिवक्ता होने के कारण ब्रिज बिहारी लाल उन स्वतंत्रता सेनानियों के लिए महत्वपूर्ण कानूनी सहारा बने, जिनके खिलाफ ब्रिटिश शासन के दौरान मुकदमे चलाए जाते थे।
उपलब्ध विवरणों के अनुसार उन्होंने कई मामलों में आंदोलन से जुड़े लोगों की पैरवी की और कई बार बिना पेशेवर शुल्क के भी कानूनी सहायता उपलब्ध कराई।
इस तरह अदालत के भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों के साथ खड़े रहे।

नलगढ़ा फार्म बना आंदोलनकारियों का आश्रय
ब्रिज बिहारी लाल का नलगढ़ा कृषि फार्म उनके स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े योगदान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
उपलब्ध विवरणों के अनुसार नलगढ़ा फार्म पर आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं को आश्रय, भोजन और विश्राम उपलब्ध कराया जाता था। दादरी के आसपास स्थित यह क्षेत्र वर्तमान में गौतम बुद्ध नगर जिले से जुड़ा है।
7 नवंबर 1930 को ब्रिटिश सीआईडी द्वारा नलगढ़ा फार्म पर छापे का भी उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि तलाशी के बाद वहां मौजूद फसल को नुकसान पहुंचाया गया, कुछ सामान जब्त किया गया और फार्म पर निगरानी बढ़ा दी गई।
इस घटना से संबंधित मूल ब्रिटिश गुप्तचर रिपोर्ट या अन्य प्राथमिक अभिलेख उपलब्ध होने पर स्थानीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को और प्रमाणिक रूप से समझने में मदद मिल सकती है।
भारत छोड़ो आंदोलन में गिरफ्तार हुए
सन् 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन स्वतंत्रता संघर्ष का निर्णायक चरण था। 8 अगस्त 1942 को कांग्रेस ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया और महात्मा गांधी ने ‘करो या मरो’ का आह्वान किया।
इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने देशभर में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां शुरू कर दीं।
उपलब्ध विवरण के अनुसार ब्रिज बिहारी लाल को अगस्त 1942 में नलगढ़ा क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया। यह उनके राजनीतिक जीवन की पहली गिरफ्तारी बताई जाती है।
24 सितंबर 1942 को सुनाई गई सजा
गिरफ्तारी के बाद उनके खिलाफ मुकदमा चलाया गया। उपलब्ध विवरण के अनुसार 24 सितंबर 1942 को उन्हें भारत रक्षा नियमों की धारा 38(5) के तहत दोषी ठहराया गया।
उन्हें तीन माह के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई और बुलंदशहर जिला कारागार भेज दिया गया।
1943 में जेल में हुआ निधन
उपलब्ध विवरणों के अनुसार बाबू ब्रिज बिहारी लाल का 1943 में बुलंदशहर जिला कारागार में निधन हो गया। उस समय उनकी उम्र करीब 53-54 वर्ष थी।
उनकी मृत्यु को लेकर स्थानीय स्तर पर यह दावा भी मिलता है कि ब्रिटिश अधिकारियों के आदेश पर उन्हें हिरासत में पारे (Mercury) का विष दिया गया था। हालांकि इस दावे को प्राथमिक सरकारी, चिकित्सकीय या अभिलेखीय प्रमाण उपलब्ध होने तक प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता। इसे स्थानीय स्मृति या मौखिक परंपरा के रूप में ही देखा जाना उचित है।
स्वतंत्र भारत में भी दर्ज हुआ योगदान
स्वतंत्रता के बाद भी ब्रिज बिहारी लाल के योगदान का उल्लेख स्वतंत्रता सेनानियों से संबंधित स्थानीय और सरकारी स्मृति सामग्री में मिलता है।
उपलब्ध विवरण के अनुसार 22 जून 1956 को उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन संसदीय सचिव बनारसी दास ने उन्हें 1942 के आंदोलन में सक्रिय रहे अनुभवी कांग्रेस नेता के रूप में वर्णित किया था।
2003 में बनाया गया स्मारक द्वार
बाबू ब्रिज बिहारी लाल की स्मृति को स्थायी रूप देने के लिए 6 दिसंबर 2003 को बुलंदशहर में उनके सम्मान में स्मारक द्वार का उद्घाटन किए जाने का उल्लेख मिलता है।
यह स्मारक आज भी उनके योगदान की याद दिलाने वाला प्रतीक माना जाता है। हालांकि उनके जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान पर और अधिक व्यवस्थित शोध तथा दस्तावेजीकरण की आवश्यकता है।
प्रतिमा स्थापित करने की मांग
बाबू ब्रिज बिहारी लाल के योगदान को देखते हुए उनके सम्मान में बुलंदशहर में प्रतिमा स्थापित किए जाने की मांग भी सामने आ रही है।
उनकी प्रतिमा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का केंद्र बन सकती है और यह संदेश दे सकती है कि भारत की आजादी केवल बड़े राजनीतिक आंदोलनों का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे देश के अलग-अलग हिस्सों में हजारों लोगों का त्याग और संघर्ष भी शामिल था।
इतिहास के पन्नों में फिर दर्ज हो उनका नाम
बाबू ब्रिज बिहारी लाल ‘ब्रह्मानंद वकील’ की कहानी स्थानीय स्वतंत्रता आंदोलन के उस अध्याय को सामने लाती है, जिसमें अधिवक्ता, शिक्षक, किसान, व्यापारी और सामाजिक कार्यकर्ता अपने-अपने स्तर पर ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे।
उन्होंने वकालत को आजीविका, राजनीति को जनसेवा और अपनी संपत्ति को राष्ट्रहित का माध्यम बनाया। उनके जीवन की यही सबसे बड़ी विशेषता है।
बुलंदशहर में उनके सम्मान में बना स्मारक द्वार उनकी स्मृति को जीवित रखता है। अब आवश्यकता है कि उनके जीवन से जुड़े सरकारी अभिलेख, न्यायालयीन दस्तावेज, पुराने समाचार पत्र और स्थानीय मौखिक इतिहास को एकत्र कर उनका विस्तृत जीवन-वृत्त तैयार किया जाए।
बाबू ब्रिज बिहारी लाल जैसे स्वतंत्रता सेनानियों का स्मरण केवल अतीत को याद करना नहीं है, बल्कि उस स्वतंत्रता के मूल्य को समझना भी है, जिसके लिए अनेक लोगों ने अपना सुख, संपत्ति, प्रतिष्ठा और जीवन तक त्याग दिया।
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