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हसदेव अरण्य जंगल में कोयला खनन को मिली पर्यावरण मंजूरी, 4.48 लाख पेड़ों की कटाई के प्रस्ताव पर फिर बढ़ा विवाद

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Source: SNF & Dainik Bhaskar
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The Journalist News (Lucknow): छत्तीसगढ़ के घने हसदेव-अरण्य (Hasdeo-Arand) वन क्षेत्र में प्रस्तावित केंटे एक्सटेंशन इंटीग्रेटेड कोल ब्लॉक को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से पर्यावरणीय मंजूरी (Environmental Clearance) मिल गई है। इस मंजूरी के साथ परियोजना के तहत कोयला खनन का रास्ता साफ हो गया है। प्रस्तावित परियोजना की उत्पादन क्षमता 9 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) निर्धारित की गई है। यह मंजूरी ऐसे समय में मिली है जब कुछ सप्ताह पहले ही परियोजना को वन भूमि उपयोग के लिए सैद्धांतिक (In-Principle) वन स्वीकृति भी प्राप्त हुई थी। इसके साथ ही हसदेव-अरण्य क्षेत्र में यह तीसरी बड़ी कोयला खनन परियोजना बन गई है जिसे आवश्यक मंजूरियां मिल चुकी हैं।

राजस्थान की बिजली कंपनी को आवंटित है कोल ब्लॉक

केंटे एक्सटेंशन कोल ब्लॉक राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (Rajasthan Rajya Vidyut Utpadan Ltd.) को आवंटित किया गया है। परियोजना का विकास और संचालन अडानी समूह द्वारा किया जाना प्रस्तावित है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, परियोजना का उद्देश्य ऊर्जा क्षेत्र की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कोयला उत्पादन बढ़ाना है।

A dense green forest stretches to the horizon with distant hazy mountains and a pale sky in the background.
Source SNF

1,742 हेक्टेयर वन भूमि और 4.48 लाख पेड़ों पर असर

परियोजना के लिए 1,742.6 हेक्टेयर वन भूमि के उपयोग की अनुमति दी गई है। इसके अलावा चरणबद्ध तरीके से लगभग 4.48 लाख पेड़ों की कटाई का भी प्रस्ताव है। यही पहलू इस परियोजना को लेकर सबसे अधिक विवाद का कारण बना हुआ है। पर्यावरणविदों और स्थानीय समुदायों का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से वन पारिस्थितिकी (Forest Ecosystem) और जैव विविधता पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

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वन्यजीव संस्थान ने दी थी अलग राय

साल 2021 में भारतीय वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India) द्वारा किए गए जैव विविधता आकलन (Biodiversity Assessment) में सिफारिश की गई थी कि हसदेव-अरण्य कोलफील्ड में आगे कोई नया खनन नहीं किया जाना चाहिए। रिपोर्ट में आशंका जताई गई थी कि अतिरिक्त खनन गतिविधियों से क्षेत्र की जैव विविधता और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि पर्यावरण मंत्रालय ने आवश्यक प्रक्रिया पूरी होने के बाद परियोजना को मंजूरी प्रदान कर दी है।

स्थानीय आदिवासी समुदायों का विरोध

परियोजना को लेकर स्थानीय आदिवासी समुदायों और कांग्रेस ने भी विरोध दर्ज कराया है। उनका कहना है कि बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र प्रभावित होने से जंगलों पर निर्भर समुदायों की आजीविका, पारंपरिक जीवनशैली और पर्यावरण पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। विरोध करने वाले समूहों की मांग है कि पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का व्यापक मूल्यांकन किया जाए तथा स्थानीय लोगों की चिंताओं को प्राथमिकता दी जाए।

ऊर्जा और पर्यावरण के बीच संतुलन की चुनौती

यह परियोजना एक बार फिर विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की बहस को सामने लेकर आई है। एक ओर सरकार और परियोजना से जुड़े पक्ष ऊर्जा सुरक्षा तथा बिजली उत्पादन की आवश्यकता पर जोर देते हैं, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण विशेषज्ञ और स्थानीय समुदाय जंगलों के संरक्षण और जैव विविधता को बचाने की जरूरत पर बल दे रहे हैं। फिलहाल परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी मिल चुकी है। आगे परियोजना का क्रियान्वयन संबंधित शर्तों और लागू पर्यावरणीय नियमों के तहत किया जाएगा। साथ ही, इस मुद्दे पर विभिन्न पक्षों की राय और संभावित कानूनी एवं प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर भी आने वाले समय में नजर बनी रहेगी।

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