The Journalist News (Lucknow): देश में पुरुषों के अधिकारों और कल्याण के लिए एक अलग संवैधानिक संस्था बनाने की मांग अब संसद तक पहुंच गई है। राज्यसभा सांसद अशोक कुमार मित्तल ने राष्ट्रीय पुरुष आयोग विधेयक (National Commission for Men Bill) पेश किया है। इस प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य पुरुषों के अधिकारों की रक्षा, उनकी शिकायतों के समाधान और कानूनी व सामाजिक सहायता के लिए एक संस्थागत व्यवस्था तैयार करना है। यह प्रस्ताव हाल ही में चर्चा में आए पुणे के रियल एस्टेट कारोबारी केतन अग्रवाल से जुड़े मामले के बाद सामने आया है। विधेयक पेश करते समय सांसद ने कहा कि कानून के सामने सभी नागरिक समान हैं और यदि कोई पुरुष भी अपराध का शिकार होता है तो उसे भी न्याय, कानूनी सुरक्षा और संस्थागत सहायता मिलनी चाहिए।
क्या है राष्ट्रीय पुरुष आयोग विधेयक?
प्रस्तावित विधेयक के अनुसार, राष्ट्रीय पुरुष आयोग एक स्वतंत्र संस्थागत निकाय के रूप में कार्य करेगा। इसका मुख्य उद्देश्य पुरुषों से जुड़ी शिकायतों की जांच करना, उनके अधिकारों और कल्याण की रक्षा करना तथा सरकार को आवश्यक नीतिगत सुधारों की सिफारिश करना होगा। विधेयक में कहा गया है कि आयोग पुरुषों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों पर काम करेगा, जिनमें शामिल हैं
- कानूनी विवाद
- मानसिक स्वास्थ्य
- घरेलू हिंसा
- भेदभाव
- सामाजिक कल्याण
- पारिवारिक विवाद
- अभिरक्षा (Custody) से जुड़े मामले
- कार्यस्थल पर उत्पन्न समस्याएं
इसके अलावा आयोग संबंधित मामलों में सरकार को सुझाव देने और आवश्यक सुधारों की अनुशंसा भी कर सकेगा।

कौन-कौन सी सुविधाएं देने का प्रस्ताव?
विधेयक में केवल शिकायतों की सुनवाई ही नहीं, बल्कि पुरुषों के लिए व्यापक सहायता व्यवस्था का भी प्रस्ताव रखा गया है। प्रस्ताव के अनुसार आयोग निम्नलिखित सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में काम करेगा
- जरूरतमंद पुरुषों को कानूनी सहायता
- मनोवैज्ञानिक परामर्श (Counselling)
- पुनर्वास सहायता
- शोध एवं अध्ययन
- जागरूकता अभियान
- भावनात्मक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम
- स्वस्थ और सकारात्मक पुरुषत्व (Healthy Masculinity) को प्रोत्साहित करने वाली पहल
इसका उद्देश्य केवल विवादों का समाधान करना नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक स्तर पर पुरुषों के सामने आने वाली चुनौतियों को भी संबोधित करना है।
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केतन अग्रवाल मामले का क्यों हुआ जिक्र?
विधेयक पेश करते समय सांसद अशोक कुमार मित्तल ने हाल ही में सामने आए पुणे के रियल एस्टेट कारोबारी केतन अग्रवाल के कथित हत्या मामले का उल्लेख किया। उनका कहना था कि यह मामला इस बात की याद दिलाता है कि पुरुष भी अपराध, हिंसा और उत्पीड़न के शिकार हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक पीड़ित को, चाहे वह महिला हो या पुरुष, समान रूप से न्याय और कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए। उनके अनुसार वर्तमान में महिलाओं के लिए कई संस्थागत व्यवस्थाएं मौजूद हैं, जबकि पुरुषों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा कोई समर्पित आयोग नहीं है।
देशभर में शुरू हुई बहस
राष्ट्रीय पुरुष आयोग का प्रस्ताव सामने आने के बाद देशभर में इस पर बहस तेज हो गई है। समर्थकों का मानना है कि यह आयोग लंबे समय से महसूस की जा रही संस्थागत कमी को पूरा कर सकता है। उनका कहना है कि कई पुरुष पारिवारिक विवाद, तलाक, बच्चों की अभिरक्षा, मानसिक तनाव, कार्यस्थल की समस्याओं और कुछ कानूनों के कथित दुरुपयोग जैसी परिस्थितियों का सामना करते हैं। ऐसे मामलों में शिकायत दर्ज कराने और सहायता प्राप्त करने के लिए एक समर्पित मंच होना चाहिए। दूसरी ओर, कुछ विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि इस विधेयक पर विस्तृत संसदीय चर्चा आवश्यक है। उनका तर्क है कि यदि ऐसा आयोग बनाया जाता है तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इससे महिलाओं के लिए पहले से उपलब्ध कानूनी सुरक्षा कमजोर न हो और न ही मौजूदा संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र में अनावश्यक टकराव पैदा हो।
क्या अभी बन गया है राष्ट्रीय पुरुष आयोग?
नहीं। फिलहाल राष्ट्रीय पुरुष आयोग का गठन नहीं हुआ है। राज्यसभा में पेश किया गया यह एक निजी सदस्य विधेयक (Private Member’s Bill) है। इसका अर्थ है कि इसे किसी मंत्री द्वारा नहीं, बल्कि एक सांसद द्वारा पेश किया गया है। भारत में निजी सदस्य विधेयकों को कानून बनने के लिए कई संसदीय चरणों से गुजरना पड़ता है। इनमें सदन में चर्चा, समिति द्वारा परीक्षण (यदि आवश्यक हो), दोनों सदनों से पारित होना और अंत में राष्ट्रपति की मंजूरी शामिल होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में निजी सदस्य विधेयकों का कानून बनना अपेक्षाकृत दुर्लभ है, हालांकि ऐसे प्रस्ताव कई महत्वपूर्ण नीतिगत चर्चाओं की शुरुआत करते हैं।
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