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ईरान-इजरायल का संघर्ष कहीं ले न ले भारतीय छात्रों की जान, ओवैसी ने छात्रों की वतन वापसी की लगाई गुहार

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ओवैसी और पीएम मोदी
ओवैसी और पीएम मोदी
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रूस और यूक्रेन के बीच युद्घ की शुरुआत होते ही भारत सरकार ने दोनों देशों में रह रहे भारतीयों की वतनवापसी करा दी। लेकिन इन दिनों मिडिल ईस्ट में चल रहे ईरान-इजरायल संघर्ष के बीच वहां रह रहे भारतीय छात्रों पर भारत सरकार ध्यान नहीं दे रही है। इसी बीच AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने एक अहम मुद्दे की ओर ध्यान दिलाया है।

ओवैसी ने एक ट्वीट के जरिए जानकारी दी कि, ईरान में 1,595 भारतीय छात्र फंसे हुए हैं, जिनमें से 140 मेडिकल छात्र तेहरान यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे हैं। इसके अलावा, इराक में 183 भारतीय श्रद्धालु भी संकट में फंसे हैं। ओवैसी ने बताया कि उन्होंने विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव (PAI) आनंद प्रकाश से संपर्क किया है और वहां फंसे सभी भारतीय नागरिकों की पूरी जानकारी भी साझा कर दी है. उन्होंने विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर से तत्काल ईरान से भारतीय लोगों को निकालने के अभियान को शुरू करने की अपील की है।

इसके अलावा तेलंगाना से संबंधित छात्रों और श्रद्धालुओं की सुरक्षित वापसी के लिए ओवैसी ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री कार्यालय से भी अपील की है। AIMIM चीफ ओवैसी ने अपने ट्वीट किया कि, “ईरान में 1,595 भारतीय छात्र फंसे हुए हैं, जिनमें 140 मेडिकल छात्र तेहरान यूनिवर्सिटी में हैं. इसके अलावा, 183 भारतीय श्रद्धालु इराक में फंसे हैं. मैंने PAI के संयुक्त सचिव आनंद प्रकाश से संपर्क किया है और सभी की जानकारी शेयर की है. अब जल्द से जल्द निकासी जरूरी है. मैं विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और तेलंगाना सीएमओ से अपील करता हूं कि इनकी सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की जाए.”

बता दें कि, इस समय ईरान और इजरायल के बीच चल रही सैन्य कार्रवाई से न केवल इन देशों बल्कि आसपास के इलाकों में भी स्थिति अस्थिर है। एयरस्पेस बंद हैं, बमबारी और ड्रोन हमलों की खबरें लगातार आ रही हैं. ऐसे में भारतीय नागरिकों की जान को खतरा होने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता। ईरान और इजरायल में भारतीय दूतावास ने वहां मौजूद भारतीयों को सतर्क और सुरक्षित रहने के अपील की है। दरअसल, ईरान और इज़रायल के बीच का संघर्ष कई दशक पुराना, जटिल और बहुआयामी है। यह केवल एक क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा नहीं है, बल्कि इसमें धार्मिक, वैचारिक, रणनीतिक और भू-राजनीतिक पहलू शामिल हैं।

दोनों देशों के बीच इस संघर्ष की शुरुआत साल 1979 की ईरानी इस्लामी क्रांति से हुई। यहां ईरान में शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी का शासन था जो अमेरिका और इज़रायल के बहुत करीब था। लेकिन 1979 में अयातुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में इस्लामी क्रांति हुई और ईरान एक कट्टरपंथी इस्लामी गणराज्य बन गया। इसके बाद ईरान ने इज़रायल को “अवैध यहूदी राज्य” कहकर न केवल राजनयिक संबंध तोड़ दिए, बल्कि उसे “इस्लाम और मानवता का दुश्मन” घोषित कर दिया। यहां संघर्ष का एक बड़ा कारण वैचारिक विरोध भी है। ईरान का इस्लामी शासन इज़रायल के अस्तित्व को ही नकारता है और फिलिस्तीन को पूरा “इस्लामी क्षेत्र” मानता है। इज़रायल, एक यहूदी राष्ट्र होने के नाते, ईरान को एक कट्टर इस्लामी खतरे के रूप में देखता है।

इसके अलावा फिलिस्तीन और हिज़्बुल्लाह समर्थन जैसे ईरान हमास (गाज़ा में) और हिज़्बुल्लाह (लेबनान में) जैसे आतंकवादी संगठनों को आर्थिक और सैन्य समर्थन देता है, जो इज़रायल पर रॉकेट और हमले करते हैं।इज़रायल इन्हें ईरान के “पॉक्सी वार” (छद्म युद्ध) का हिस्सा मानता है। वहीं ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी वजह है क्योंकि, इज़रायल को डर है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित कर रहा है, जिससे उसका अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। इसलिए इज़रायल ईरान के परमाणु ठिकानों पर साइबर अटैक, वैज्ञानिकों की हत्या और कूटनीतिक विरोध करता रहा है।

ईरान सीरिया और इराक में अपने शिया मिलिशिया के जरिए मौजूद है। इज़रायल ने कई बार सीरिया में ईरानी ठिकानों पर हवाई हमले किए हैं। वैसे तो ये संघर्ष लंबे समय से चल रहा है। लेकिन अप्रैल 2024 में तनाव बढ़ा है। 7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इज़रायल पर हमला किया; इसके बाद गाज़ा में युद्ध छिड़ गया। तब ईरान ने हमास का खुला समर्थन किया। इज़रायल ने ईरान के क़ुद्स फोर्स और हिज़्बुल्लाह पर हमले तेज कर दिए। औऱ 13 अप्रैल 2024 को ईरान ने पहली बार सीधा मिसाइल और ड्रोन हमला इज़रायल पर किया (300+ मिसाइलें), जिसे इज़रायल और उसके सहयोगियों (अमेरिका, फ्रांस) ने रोक दिया।

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